आलोचना पसंद कोई नहीं करता, चाहते सब हैं। वह पसंद इसलिए नहीं की जाती कि वह अक्सर प्रियंवद नहीं होती और चाहते उसे सब इसलिए हैं कि चर्चित होने का सब से सीधा रास्ता वही है ।
प्रोफेसर धनंजय वर्मा
पूर्व कुलपति (डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्यप्रदेश)
जन्म - 14 जुलाई 1935 ग्राम छातेर, तहसील - उदयपुरा,
(पूर्व भोपाल रियासत) अब - जिला
रायसेन
देहावसान - 28 जनवरी 2024
शैशवावस्था- पांच वर्ष की उम्र में पिता श्री धीरज वर्मा के निधन के बाद माता श्रीमती कल्याणी वर्मा एवं छोटी बहन श्रीमती प्रेमा को नाना श्री मुरलीधर वर्मा जगदलपुर ले गए। प्रारम्भिक शिक्षा दीक्षा वहीं हुई। बस्तर हाईस्कूल जगदलपुर से 1953 में मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम श्रेणी और हिंदी तथा केमेस्ट्री विषय में डिस्टिंक्शन के साथ उत्तीर्ण होने पर बस्तर के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर श्री आर.सी.वी.पी. नरोन्हा आई.सी.एस. ने विशेष स्टेट मेरिट स्कॉलरशिप से अध्ययन की व्यवस्था की। आज जो पद- प्रतिष्ठा,यश प्राप्त किया है यह उन दोनों की असीम कृपा और आशीर्वाद है ।
शैक्षणिक योग्यता- एम.ए., पी.एच.डी.
मेधावी छात्र के रूप में प्राथमिक कक्षा से उच्च शिक्षा तक प्रावीण्य सूची में प्रथम रहे।
मध्य प्रदेश के पुराने व सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय सागर विश्वविद्यालय,सागर [वर्तमान में डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यलय] में कुलपति पद पर आसीन रहे।
श्रीमती करुणा वर्मा
मेरी हिम्मत,विश्वास,व्यक्तिगत व साहित्यिक जीवन की सहयात्री।
| परिवार | |
|---|---|
| 1. | ज्येष्ठ पुत्री -प्रोफ़ेसर [डॉ.] मनीषा महापात्रा -समाजशास्त्र विभाग,शासकीय स्नात्तकोतर महिला महाविद्यालय,रायपुर,छत्तीसगढ़। |
| 2. | ज्येष्ठ पुत्र -श्री कार्तिकेय वर्मा - मुख्य परिचालन अधिकारी,लंदन स्थित जेम स्टोन माइनिंग कंपनी की मुम्बई शाखा में पदस्थ। |
| 3. | कनिष्ठ पुत्री -डॉ. निवेदिता वर्मा - सहायक प्राध्यापक, डॉ. आम्बेडकर पीठ,विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन, म.प्र.। |
| 4. | कनिष्ठ पुत्र-श्री आदित्य वर्मा - स्व व्यवसाय,छत्तीसगढ़। |
|
व्याख्याता - छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर, शासकीय महाविद्यालय, जगदलपुर, हमीदिया महाविद्यालय, भोपाल। सहायक प्राध्यापक एवं प्राध्यापक - शासकीय महाविद्यालय खण्डवा, नरसिंहपुर, भोपाल, बरेली (मध्यप्रदेश शासन-उच्च शिक्षा विभाग) कुलपति - डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (पूर्व सागर । विश्वविद्यालय) |
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|
शोध-अनुसंधान: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अन्तर्गत सागर विश्वविद्यालय में 1977 से 1980 तक टीचर फैलो। (विषय : आधुनिकता के सन्दर्भ में छायावादोत्तर हिन्दी काव्य का अनुशीलन) |
|
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प्रशासकीय अनुभव : संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन, 1980 से 1982 तक प्रतिनियुक्ति पर ओ.एस.डी. (विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी)। 1. सृजनात्मक कलाओं के वार्षिक राष्ट्रीय कालिदास सम्मान और साहित्य, प्रदर्शनकारी एवं रुपंकर कलाओं के राज्यस्तरीय शिखर सम्मान का प्रभार। 2. अन्तरप्रादेशिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम और ललित कला एवं संगीत शिक्षा के पुनर्गठन का प्रभार। 3. आदिवासी और लोककलाओं के प्रोत्साहन एवं संरक्षण के लिए लगभग एक दर्जन योजनाओं का निर्माण एवं प्रवर्तन। 4. क्षेत्रीय आदिवासी एवं लोक कलाओं के उत्सव, प्रदर्शनियों, संगोष्ठियों एवं सम्मेलनों का आयोजन। 5. क्षेत्रीय आदिवासी एवं लोक कलाओं के उत्सव, प्रदर्शनियों, संगोष्ठियों एवं सम्मेलनों का आयोजन। |
डाॅ. धनंजय वर्मा के आलोचना कर्म को लगभग छह दशक पूरे हो रहे हैं। 1953-55 के आस-पास तो उनका लेखन जगदलपुर (बस्तर) और रायपुर (छत्तीसगढ़) की स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं तक सीमित रहा, लेकिन 1957 से वे ‘आलोचना’ में लगभग नियमित लिखने लगे। 1957-59 में वे सागर विश्वविद्यालय, सागर के एम.ए. (हिन्दी) के विद्यार्थी थे। उनके गुरु आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी तब ‘आलोचना’ के सम्पादक थे। उनके ही निर्देशन में उन्होंने 1959 में निराला के काव्य पर लघु-शोघ-प्रबन्ध लिखा: निराला: काव्य और व्यक्तित्व। यह 1960 में प्रकाशित हो गया। प्रोफेसर अक्षय कुमार जैन के शब्दों में ‘‘उस समय महाप्राण निराला पर कोई प्रामाणिक शोध-ग्रन्थ नहीं आया था। पहले प्रकाशन के बाद ही यह स्तरीय आलोचक मान लिए गए और विश्वविद्यालय में डाॅ. वर्मा के समकालीन डाॅ. शिव कुमार मिश्र याद करते हैं कि ‘‘एम.ए. पास धनंजय वर्मा मात्र उसके नाते डाॅ. धनंजय वर्मा के रूप में चर्चित होने लगे। ऐसा था उनका लघु-प्रबन्ध। ......
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निराला काव्य पुनर्मूल्यांकन:- प्रकाशित पुस्तक निराला काव्य और व्यक्तित्व, 1960, दूसरा संस्करण 1965, संशोधित एवं परिवर्द्धित संस्करण 1973
प्रकाशक - विद्या प्रकाशन मंदिर, 1681, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, जगदीश शुक्ल, पी-10 , नवीनशाहदरा, दिल्ली - 110032 |
आस्वाद के धरातल1969 प्रकाशक - विद्या प्रकाशन मंदिर, 1681, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, जगदीश शुक्ल, पी-10 , नवीनशाहदरा, दिल्ली - 110032 Digital Edition |
अंधेरा नगर रचनात्मक गद्य1971 प्रकाशक - विद्या प्रकाशन मंदिर, 1681, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, जगदीश शुक्ल, पी-10 , नवीनशाहदरा, दिल्ली - 110032 Digital Edition |
हस्तक्षेप1975 प्रकाशक - विद्या प्रकाशन मंदिर, 1681, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, जगदीश शुक्ल, पी-10 , नवीनशाहदरा, दिल्ली - 110032 Digital Edition |
आलोचना की रचना यात्रा1978 प्रकाशक - विद्या प्रकाशन मंदिर, 1681, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, जगदीश शुक्ल, पी-10 , नवीनशाहदरा, दिल्ली - 110032 Digital Edition |
आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय1984 प्रकाशक - विद्या प्रकाशन मंदिर, 1681, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, जगदीश शुक्ल, पी-10 , नवीनशाहदरा, दिल्ली - 110032 |
आधुनिकता के प्रतिरूप1986 प्रकाशक - विद्या प्रकाशन मंदिर, 1681, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, जगदीश शुक्ल, पी-10 , नवीनशाहदरा, दिल्ली - 110032 Digital Edition |
हिन्दी कहानी का रचनाशास्त्र1988 प्रकाशक - प्रवीण प्रकाशन 1-1079, मेहरौली, नई दिल्ली-110030 011-26641833, 011-26646773 9312229307 Digital Edition |
समावेशी आधुनिकता1991 प्रकाशक - विद्या प्रकाशन मंदिर, 1681, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, जगदीश शुक्ल, पी-10 , नवीनशाहदरा, दिल्ली - 110032 Digital Edition |
हिन्दी कहानी का सफ़रनामा2001 प्रकाशक - प्रवीण प्रकाशन 1-1079, मेहरौली, नई दिल्ली-110030 011-26641833, 011-26646773 9312229307 Digital Edition |
परिभाषित परसाई: 20012001 प्रकाशक - शिलालेख 4/32, सुभाष गली, विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली-110032 011-2044184 011-2041327 Digital Edition |
हिन्दी उपन्यास का पुनरावतरण2003 प्रकाशक - प्रवीण प्रकाशन 1-1079, मेहरौली, नई दिल्ली-110030 011-26641833, 011-26646773 9312229307 Digital Edition |
लेखक की आज़ादी2003 प्रकाशक - आशु प्रकाशन, 1143/31, पुराना कटरा, इलाहाबाद-211002 0532-2466870 0532-2466870 |
आलोचना के सरोकार2003 प्रकाशक - साहित्य भण्डार, 50, चाहचन्द,इलाहाबाद- 211003, 9415214878 8874029428 Digital Edition |
परम अभिव्यक्ति की खोज (मुक्तिबोध के काव्य का पुनर्मूल्याकंन2004 प्रकाशक - परिमल प्रकाशन:17 एम.आई.जी., वाघम्बरीआवास योजना, अल्लापुर, इलाहाबाद, 211006- 9811053214 Digital Edition |
आलोचना की ज़रूरत2005 प्रकाशक - अनुभूति प्रकाशन, 53, करनपुर, प्रयाग स्टेशन, इलाहाबाद-21100 0532-2466870 Digital Edition |
आलोचक का अंतरंग (साक्षात्कार)2005 प्रकाशक - आलेख प्रकाशन, वी-8, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032 011-22590582, 011-22381582 |
एक आवाज़: सबसे अलग (दुष्यंत की रचनाशीलता)2008 प्रकाशक - प्रस्तुति प्रकाशन, सिविल लाइन्स, नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) 9425168617 |
नीम की टहनी (कविताएँ)2013 प्रकाशक - शिल्पायन, 10295, लेन नं. 1,वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा,दिल्ली- 110032, 9810101036 |
आलोचना के आयाम2013 प्रकाशक - साहित्य भण्डार, 50, चाहचंद, इलाहाबाद 211003, 9415214878,8874029428 Digital Edition |
साझी विरासत (उर्दू काव्य विमर्श)2013 प्रकाशक - शिल्पायन, 10295, लेन नं. 1,वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा,दिल्ली-110032- 9810101036 Digital Edition |
अभिव्यक्ति के रूपाकार2013 प्रकाशक - साहित्य भण्डार, 50, चाहचंद, इलाहाबाद 211003, 9415214878,8874029428 |
निराला-काव्यः पुनर्मूल्याकंन2019 प्रकाशक - पहले.पहलप्रकाशन, 25-ए, प्रेसकाम्पलेक्स ज़ोन-1,एम.पी.नगर, भोपाल-462011 0755-2555789,2573626 |
आलोचना के उत्तर अयन2019 प्रकाशक - साहित्य भण्डार, 50, चाहचंद, ज़ीरो रोड, प्रयागराज,इलाहाबाद-211003, 9415214878,8874029428 Digital Edition |
ख़ुतूत से नुमायाँ हमदम2019 प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, 18,इन्स्टीट्यूशनल एरिया लोदी रोड, नयी दिल्ली-110003, 011-24626467 011-24654196 |
आलोचक के बयान2020 प्रकाशक - आइसेक्ट पब्लिकेशंस, 23-ए, प्रेस कॉम्पलेक्स ज़ोन-1, एम.पी. नगर, भोपाल.462011, 0755-4923952 |
यूँ होता तो क्या होता (शानी की पत्र-कथा)2022 प्रकाशक - आइसेक्ट पब्लिकेशंस, 23-ए, प्रेस कॉम्पलेक्स ज़ोन-1, एम.पी. नगर, भोपाल.462011, 0755-4923952 |
आलोचना के अनुवाक2024 प्रकाशक - विश्वबानी पब्लिकेशन्स एफ-54, फ़्रेंड्स कॉलोनी, अशोका गार्डन, भोपाल] मध्यप्रदेश - 462023 |
शिलाओं पर तराशे मज़्मून (धनंजय वर्मा पर एकाग्र)2010 प्रकाशक - शिल्पायन, 10295, लेन नं.-1, वेस्ट गोरख पार्क शाहदरा, दिल्ली-110032, 011-22821174 9810101036 |
आलोचना के शिखर पुरुष: धनंजय वर्मा2010 प्रकाशक - साहित्य भण्डार, 50, चाहचंद ज़ीरो रोड, प्रयागराज, इलाहाबाद-2011003, 9415214878,8874029428 |
आलोचना के अमृत पुरुष: धनंजय वर्मा2013 प्रकाशक - रिसर्च लिंक प्रकाशन, 81, सर्वसुविधा नगर, बंगाली चौराहा, महाराष्ट्र बैंक के पीछे, इन्दौर (म.प्र.) 452016, डॉ.रमेश सोनी 9926497611 |
आलोचना के शिलालेख2014 प्रकाशक - सस्ता साहित्य मंडल, एन-77, पहली मंज़िल, कनॉट सरकस, नयी दिल्ली-110001 011-41523565,23310505 9899549475 |
समावर्तन |
राग भोपाली |
जीवन का महाराग
|
आलोचना के सव्य साची: धनंजय वर्मा |
वाणी की विभूति (व्याख्यान) |
तस्कीन |
सुलगते नहीं है दिल |
वह क्या नदी थी : शानी के लिए |
कमला प्रसाद के लिए दो कविताएं |
“आलोचना
को रचना और
उसके अनुभव और
बोध से असहमत
होने का पूरा
अधिकार है।
ठीक वैसे ही, जैसे कि
रचना को इस
संसार से एक
प्रतिसंसार
रचने के दौरान,
उससे असहमत
होने और यहां
तक कि उसे
खारिज करने तक
का पूरा
अधिकार है।
रचना की
स्वायत्तता
का मतलब यही
हैं और इसीलिए
आलोचना की
स्वायत्तता
और
ज़िम्मेदारी
भी बढ़ जाती
हैं। एक बेहतर
दुनिया, जैसे
रचना की आदिम
उत्तेजना है,
ठीक वैसे ही,
एक बेहतर
रचना, आलोचना
की आदिम
प्रतिज्ञा
है। आलोचना की
असहमति और
हस्तक्षेप का
मतलब और मकसद
भी रचना के अनुभव
और बोध का
विस्तार ही
हैं। किसी
चुनौती की
मौजूदगी में
ही हमारी
संवेदना और
बोध तीव्र और
व्यापक होते
हैं और मानवीय
एहसास की शिद्दत
और गहराई
बढ़ती है।" - डॉ.
धनंजय वर्मा
(क) सम्पादित पुस्तकें : अब तक : उन्नीस :
1.प्रासंगिक कहानियाँ : 1977
2.आसपास की दुनिया : 1983
3.परसाई रचनावली : छह खण्ड (सह सम्पादक) : 1985
4.हिन्दी की प्रगतिशील कहानियाँ : 1986
5.आधुनिक हिन्दी कहानी : 1986
6.लोक मंगल : 1986 |
7.समसामयिक हिन्दी कहानी (नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया) : 1988 |
8.भक्तिकालीन काव्य (सह-सम्पादन) : 1990
9.भारतीयता के अमर स्वर (प्रधान सम्पादक) : 1999
10.इंग्लिश लैंग्वेज एण्ड इण्डियन कल्चर (जनरल एडीटर) : 1999
11.हिन्दी भाषा और वैज्ञानिक चेतना (प्रधान सम्पादक) :2000
12.इंग्लिश लैंग्वेज एण्ड साइंटिफिक टेम्पर (जनरल एडीटर) : 2000
13.हिन्दी भाषा और समसामयिकी (प्रधान सम्पादक) : 2001
14.इंग्लिश लैंग्वेज एण्ड ऑस्पेक्ट्स आव डेवेलपमेंट (जनरल एडीटर) 2001
15.पर्यावरण चेतना (प्रधान सम्पादक) : 2004
16.एन्वार्यनमेण्टल अवेयरनेस (जनरल एडीटर) : 2004 |
17.सुगम हिन्दी (प्रधान सम्पादक) विदेशी विद्यार्थियों के लिए के पाठ्य पुस्तक : 2005
18.सरल हिन्दी (प्रधान सम्पादक) : 2006
19.सहज हिन्दी (प्रधान सम्पादक) : 2007
(ख) विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिकाओं का विद्यार्थी एवं प्रभारी प्राध्यापक के रूप में सम्पादन।
(ग) मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की त्रैमासिक पत्रिका 'इसलिए' के सम्पादक मण्डल में।
(घ) मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की मुख पत्रिका 'वसुधा' का संपादन: 1985-1990
1. मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद् (राज्य की साहित्य अकादेमी) द्वारा वर्ष 1971 में 'आस्वाद के धरातल' पर आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी आलोचना पुरस्कार
2. उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा वर्ष 1976 में 'हस्तक्षेप' पर पुरस्कार
3. आलोचक धनंजय वर्मा, भोपाल विश्वविद्यालय में शोभना जोशी द्वारा प्रस्तुत लघुशोध प्रबन्ध-1984
4. धनंजय वर्मा - व्यक्तित्व और कृतित्व, बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल में मंजु जैन द्वारा प्रस्तुत लघु शोध प्रबन्ध 1993
5. मध्यप्रदेश का सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार सम्मान - 1995 (मिलन : जबलपुर)
6. साहित्य साधना सम्मान - 1998 (करवट कला परिषद् भोपाल)
7. प्रसंग : धनंजय वर्मा - जून 2000 (सेवासंकल्प, भोपाल के रचना प्रभाग द्वारा आयोजित)
8. भवभूति अलंकरण (मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन) जुलाई 2000
9. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल राष्ट्रीय साहित्य सम्मान, राष्ट्रीय हिन्दी अकादेमी, कोलकाता, 2 अक्टूबर 2005
10. शिलाओं पर तराशे मज़मून (धनंजय वर्मा पर एकाग्र) सम्पादक : विश्वरंजन 2010 शिल्पायन, 10295, लेन नं. 1, वेस्ट गोरखपार्क शाहदरा, दिल्ली-11032
11. आलोचना के शिखर पुरुष डॉ. धनंजय वर्मा : सम्पादन |: डॉ. आरती दुबे 2010। साहित्य भण्डार, 50 चाहचन्द, इलाहाबाद-211003
12. दूरदर्शन वृत्त चित्र : आलोचक का अन्तरंग : पटकथा : प्रभुनाथ सिंह आजमी, निर्माता : लीलाधर मण्डलोई : सर्वप्रथम राष्ट्रीय प्रसारण : 14 जनवरी 2010
13. 'धनंजय वर्मा का आलोचना संसार' शोध प्रबन्ध पर सरिता राय को पीएच.डी. की उपाधि 2013
14. आलोचना के अमृत पुरुष : डॉ. धनंजय वर्मा : सम्पादक डॉ. प्रमोद त्रिवेदी 2013 रिसर्च लिंक, इंदौर
15. सप्तवर्णी कला-साहित्य सृजन शोध पीठ, भोपाल द्वारा "श्री उमावल्लभ षडंगी भाषा- संस्कृति साहित्य समालोचना सम्मान"-2019
16. माधव राव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय, भोपाल द्वारा "डॉ. हरिकृष्ण दत्र शिक्षा सम्मान"-2019
17. वनमाली सृजन पीठ, भोपाल द्वारा "वनमाली कथा शीर्ष सम्मान"-2021
18. बरकतउल्लाह विश्वविद्यालयः भोपाल में 'समकालीन हिन्दी आलोचना और डॉ. धनंजय वर्मा का योगदान' पर डॉ. नीता व्यास को पीएच.डी.
19. विभिन्न विश्वविद्यालयों के हिन्दी परास्नातक पाठ्यक्रमों में निराला : काव्य और व्यक्तित्व, निराला काव्य : पुनर्मूल्यांकन, आस्वाद के धरातल, हस्तक्षेप आदि पुस्तकें सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत
20. बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, के हिन्दी में परास्नातक अध्ययन के लिए निर्धारित
21. अनेक लेखों के अंग्रेजी अनुवाद : लोटस (इंडिया) यूथ स्पीक्स, गाँधी प्रसंग और हितवाद में प्रकाशित
22. 'अन्धेरा नगर' की कुछ रचनाओं के पोलिश अनुवाद (ज्यूलियस पार्नोव्स्की द्वारा)
धनंजय वर्मा समकालीन रचना की सहयात्रा करते हुए उसके खतरों से परिचित हैं और धारा में इस हद तक प्रवाहित नहीं हो जाते कि उनका अपना जागृत विवेक लड़खड़ा जाय.... वे मूलतः चिन्तन में रूचि लेने वाले व्यक्ति हैं और जब व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में उतरते हैं तब वे इसी चिन्तनशीलता के सहारे आगे बढ़ते हैं।....
लहर (अजमेर : जून 1970)
धनंजय वर्मा प्रतिबद्ध और पक्षधर साहित्य की हिमायत करते हैं लेकिन उनकी समीक्षा-दृष्टि, आरोपित और इतर साहित्यिक मूल्यों के आग्रह से एकदम मुक्त ही नहीं, भिन्न भी है। समाजशास्त्रीय संदर्भो के प्रति पूरी निष्ठा के बावजूद वह आलोचक की घुसपैठ, नियंत्रण और निर्णय की मुद्रा के विरोधी हैं। इस जमीन पर खड़े होकर उनकी समीक्षा-दृष्टि के पीछे सक्रिय सूक्ष्म संतुलन के आग्रह को साफ तौर से देखा जा सकता है।....
मंच (अम्बाला : 1973)
धनंजय वर्मा आलोचना की रचनात्मकता को विशेष आग्रह के साथ रेखांकित करते हैं। वह आलोचना में इतर साहित्यिक हस्तक्षेप का स्पष्ट विरोध करते हैं। वे हर प्रकार के अतिरेक और अतिवाद से बचकर रचना और जीवन में मूल्यांकन के प्रतिमानों की स्थिति पर बल देकर प्रकारान्तर से समाज सापेक्ष्य आलोचना की प्रवृत्ति को ही रेखांकित करते हैं।......
पूर्वग्रह (भोपाल : दिसम्बर 1977)
धनंजय वर्मा के लेखों से समीक्षा का जो रूप उभर कर सामने आता है, वह किसी लेबल का मोहताज नहीं दिखता.... वह इस बात की गवाही भी देता है कि उनके लेख खंडन – मण्डन की प्रवृत्ति से नहीं, बल्कि रचनाकार को समझने की, उसकी आत्मा तक पहुंचने की तड़प से निकले हैं। उनके लेख दलवाद से ही नहीं, फतवे बाज़ी से भी मुक्त हैं और साहित्य के क्षेत्र में घुस आई कई भ्रान्त धारणाओं की गहरी खुदाई करते हैं। ....... उनमें आलोचक की तटस्थ, संतुलित और परिपक्व दृष्टि का परिचय मिलता है......
प्रकर (दिल्ली : जून 1979)
धनंजय वर्मा की आलोचना पद्धति में रचनात्मकता के तत्व देखे जा सकते हैं। निश्चय ही आलोचना का यह कलापूर्ण सृजनात्मक स्वरूप आज की हिन्दी आलोचना की अभूतपूर्व उपलब्धि है। ऐसे आलोचक, चूंकि स्वयं भी अपनी मानसिक संरचना में कलाकार होते हैं, वे सहज ही रचना के सहयात्री तथा रचना – प्रक्रिया के गवाह बन जाते हैं। ऐसे ही आलोचक किसी रचना की पुनः रचना में सफल होते हैं जो आज की आलोचना का महत्वपूर्ण कार्य है।
समीक्षा (पटना)
धनंजय वर्मा..... लेखकों के सहयात्रीपन से ऊपर उठते हुए उस बिन्दु पर पहुंचे जहां आलोचना एक वैज्ञानिक विश्वबोध विकसित करता है, जहाँ वह युग दृष्टि पाता है और उस आलोक में, रचना और रचनाकार अपना मर्म उन्मीलित करते हुए ऐतिहासिक क्रम में अपना दायित्व पूरा करते हैं।
कल्पना (हैदराबाद)
उनका प्रत्येक लेख आलोचना के नये प्रतिमान ही नहीं स्थापित करता, बल्कि उसे पाठक और रचनाकार के लिए अधिक ग्राह्य भी बनाता है.... उनका प्रत्येक लेख कहानी की तरह रोचक है और दिल में तीरे-नीमकश की खलिश छोड़ जाता है।
योजना (दिल्ली)
विषय के प्रतिपादन में लेखक की दृष्टि गहरी और साहित्य तथा जीवन के प्रति एप्रोच वैज्ञानिक है। अपने मत की स्थापना के लिए वह तर्क और युक्ति को जोशीले चिन्तन के साथ प्रस्तुत करता है।
हिन्दुस्तान (दिल्ली)
धनंजय वर्मा प्रचलित मान्यताओं पर आँख मूंदकर चलने वाले नहीं, बल्कि उनकी खूबी और खामियों पर सजग कलाकार की तरह दृष्टि रखने वाले हैं। निश्चय ही यह उनके स्वस्थ और सूक्ष्म चिन्तन का फल है। उनकी रचनायें बौद्धिक पाठकों को तोष प्रदान करती, चिन्तन के नये आयामों को उभारती और संवेदनशील पाठकों को नई तरह से सोचने को प्रेरित करती है।
नई धारा (पटना)
डॉ. धनंजय वर्मा अपने व्यापक और स्वतंत्र चिंतन, तीक्षण अंतर्दृष्टि और तलस्पर्शी विश्लेषण, निर्भीक वक्तव्य और बेलाग साफगोई के लिए चर्चित और रुसवाई की हद तक विवादास्पद हैं। अभी तक उनके द्वारा दिए गए 35 साक्षात्कारों में 485 प्रश्न तैंतीस कवियों-लेखकों -संपादकों-पत्रकारों और शोधार्थियों ने पूछे हैं। डॉ. वर्मा ने उनके उत्तर दिए हैं जिनमें दृष्टि और प्रस्थान का अंतर है। इनके माध्यम से साहित्य के सैद्धांतिक मुद्दों से लेकर व्यावहारिक आलोचना, शिक्षा और संस्कृति, व्यवस्था और राजनीति, संविधान और पत्रकारिता गर्ज की सभ्यता और संस्कृति के समकालीन परिदृश्य पर उन्होंने बहुआयामी और अनेक स्तरीय विचार-विमर्श किया है।
समावर्तन (उज्जैन)
आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय से शुरू पुस्तक त्रयी के बारे में... आधुनिकता और आधुनिकवाद के प्रत्ययों को कई व्यापक (प्रचलित और छूटे हुए भी) पक्षों से जाँचने-परखने के लिए किये गये प्रयासों में सर्वाधिक व्यवस्थित प्रयास है। डॉ. धनंजय वर्मा का जो उनकी पुस्तक 'आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय' के रूप में हमारे सामने है।...
डॉ. राजेन्द्र कुमार (सापेक्ष्य)
इन तीनों अध्यायों को सहज ही आधुनिकता सम्बन्धी अवधारणाओं का विश्वकोश कहा जा सकता है।.. (आधुनिकता के प्रतिरूप में) धनंजय वर्मा के द्वारा किये गये पुनर्मूल्यांकन से हम सहमत हों या न हों किन्तु वह विचारोत्तेजक अवश्य हैं।.....
डॉ. हरदयाल (वैचारिकी)
आधुनिकता के अब तक के विकास और उसके छद्म तथा वास्तविक, अप्रासंगिक और प्रासंगिक, अप्रामाणिक और प्रामाणिक रूपों के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींचने की कोशिश की गयी है।... धनंजय वर्मा आधुनिकता के समग्र वैचारिक चिन्तन से टकराते हैं जिसमें मनोविश्लेषणवाद या अन्तश्चेतनावाद, अस्तित्ववाद और यथार्थवाद जैसी मान्यताओं अथवा दृष्टियों का संघर्ष शामिल है।...धनंजय वर्मा पश्चिमी सन्दर्भो में और उनसे हटकर आधुनिकता के स्वरूप को स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं .....
डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव (दस्तावेज़)
"धनंजय के आलोचक में यह गुण है कि वह 'स्व' को नहीं, लेखक को आगे रखता है। छिद्रान्वेषण करके अथवा फ़तवे देकर अपनी महत्ता सिद्ध नहीं करता आलोच्य वस्तुओं के गुणों को सफाई से पाठकों को दिखाता है और उसकी आलोचना महज़ प्रशंसा नहीं लेखक को समझने-समझाने का प्रयास है और इसीलिए श्लाघनीय है"... उपेन्द्रनाथ अश्क (इलाहाबाद) हिन्दी कहानी: एक अंतरंग परिचय
"कम लोग... जहाँ तक मेरी जानकारी है... इतनी संश्लिष्ट, विचार बहुल हिन्दी लिख पाते हैं।... विचारों में मतभेद होने का यह अर्थ हरगिज नहीं होना चाहिये कि हम किसी के लेखन व चिन्तन के धरातल की अनदेखी करें।... मेरा इरादा है ...'युग साक्षी' के लिए एक लम्बी टिप्पणी तैयार करने का, जिसका शीर्षक होगा... 'प्रगतिवादी समीक्षा की वृहत्रयी' । इस त्रयी में डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह और डॉ. धनंजय वर्मा का समावेश है। तीनों की योग्यताओं, उपलब्धियों तथा सीमाओं का निर्देश करने का प्रयत्न रहेगा। मेरी राय में प्रथम और तृतीय की और द्वितीय की भी केन्द्रगत कमजोरी यह है कि वे अपने अभिमत तथा निर्णयों को प्रकट करते हुए साहित्यिक क्लासिक्स की अपेक्षा सिद्धान्त विशेष की व्याख्या और जानकारी पर अधिक बल देते हैं"...
05 अगस्त 1993 के पत्र का अंश डॉ. देवराज, कवि, कथाकार, चिन्तक और दार्शनिक: सम्पादक:युग साक्षी,लखनऊ।
"डॉ. धनंजय वर्मा प्रगतिवादी शिविर के चंद महत्वपूर्ण समीक्षकों में गिने जाते हैं । भोपाल में वे पढ़ने-लिखने में कुछ अधिक व्यस्त रहने के कारण बदनाम हैं। वे पश्चिमी साहित्य और आलोचना से भी अच्छा परिचय रखते हैं। इस दृष्टि से वे डॉ. नामवर सिंह के समान-धर्मा और समकक्ष हैं... सिर्फ यह कि उनकी भाषण पटुता और उससे सहचरित 'डिप्लोमेटिक' मनोवृत्ति से वंचित और अछूते हैं। आधुनिकता पर चिन्तन करती तीन जिल्दों में प्रकाशित उनकी महत्वपूर्ण कृति विशेष प्रशंसित हुई हैं"...
'युग साक्षी' (अप्रेल-जून 1994) की सम्पादकीय टिप्पणी ___डॉ. देवराज, कवि, कथाकार, चिन्तक और दार्शनिक, सम्पादक: युगसाक्षी, लखनऊ।
"मेरे लिए भी यह कम कीमती सुयोग नहीं था कि आप जैसे संवेदनशील और उन्मेषपूर्ण प्रतिभा की अर्चियों से परिचित हो सका। ऐसे ही सहज सम्पूर्ण, सच्चे सम्पर्क सौहार्द संवारते हैं और पारस्परिक सौमनस्य को चरितार्थ करते हैं। यहाँ के जिज्ञासुओं पर भी आपकी प्रतिभा की समुचित छाप पड़ी है, जिसने खण्डवा और उज्जैन की दूरी को नगण्य कर दिया है". डॉ. शिव मंगल सिंह 'सुमन', उज्जैन, 23 मार्च 1965 का पत्र।
'क्रान्तिकारी स्वच्छन्दतावाद की आधुनिकता' का पारायण कर कृतकृत्य हुआ। एक ही साँस में पढ़ गया। तुम्हारी लेखनी तो पकड़ती है। पहले भी प्रगतिशील लेखक संघ के किसी अधिवेशन में तुम्हारे शोधपत्र को सुन कर मेरे मन में यही प्रतिक्रिया हुई थी, शायद तुम्हें जनाया भी था। तुम्हारी, मेरे प्रति, इतनी प्रगाढ़ आत्मीयता है, इसकी इस सीमा तक प्रतीति न थी। तुमने तो जैसे मेरे अन्तर्मन का कोना-कोना झाँक लिया है। बहुत ही सुन्दर विश्लेषण है- वैज्ञानिक और निरपेक्ष ।
- डॉ. शिव मंगल सिंह 'सुमन' उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, 29 मार्च 1982 का पत्र।
"पिछले वर्षों में आलोचक की स्थिति बहुत विवादास्पद रही है। लेखक और पाठक दोनों का ही विश्वास खोकर वह मात्र उपजावी के रूप में रह गया पर इधर जिन आलोचकों ने फिर से पाठकों और लेखकों को विश्वास दिलाया है कि वे रचना के सहयात्री हैं, उनमें धनंजय वर्मा प्रमुख हैं। 'आस्वाद के धरातल' में संकलित लेखों से यह बात सहज ही स्पष्ट होती है कि आलोचक एक रचनाकार की तरह ही संलग्न है और वह पुराने और बीते हुए वंशजों की तरह फ़तवे न देकर विचारों की यात्रा को देख-समझ रहा है आलोचना दृष्टि में यह संतरण एक महत्वपूर्ण मोड़ का सूचक है और अब उम्मीद होती है कि रचना और आलोचना एक धरातल पर अपने मान-मूल्यों की तलाश करेंगे"। कमलेश्वर, सारिका, बम्बई, 15 जनवरी 1970 का पत्र
"मंच में तुम्हारा लेख पढ़कर ध्वस्त हूँ। यह इसलिए नहीं कि तुमने मुझपर लिखा है... पर इसलिए कि यह लेख सचमुच मुझ पर लिखा है- यानी मेरे रग-रग को समझकर । आलोचनात्मक लेख पढ़ते हुए यदि कहीं भीतर से भर आये और एक तकलीफ की साँस लेने के लिए लेखक रूक जाये और अपनी आँख बंद करके क्षणांश के लिए लेखक रूक जाये तो यही कहा जा सकता है कि आलोचना भी रचनात्मक हो सकती है।"... "यह जो कुछ भी और जैसा कुछ भी हो ट्रैजडी यह है कि अपनी छोडी हुई दुनिया की चाहे जितनी याद करे, वह लौटकर वहाँ नहीं जा सकता... न _"एक सड़क सत्तवान गलियाँ' में न 'जहाँ धूल उड़ जाती है न 'देवा की माँ' की गोद में.. अब सब सपना ही है.. अब न उसे 'नीली झील' दिख सकती है और न सवन हंसों का वह झुण्ड जो उसे आबाद किये हुए था । आधुनिकता की प्रक्रिया ही ऐसी है। इसके चक्र को पीछे नहीं मोड़ा जा सकता। जो छूट गया, सो छूट गया"... हाँ, धनंजय, आधुनिकता की प्रक्रिया ही ऐसी है। निरंतर परिवर्तित होते रचना संसार में, पीछे छूटे संसार के दुख बढ़ते जाते हैं, नये जुड़ते जाते हैं, कहानियाँ लिखने से वह कम नहीं होते, गहरा जाते हैं.. और शायद अंत में कोई भी कहानीकार अपने दुखों को लिए हुए अकेला रह जाता है। यही तो होना है। धनंजय, दोस्त जब हम बुड्ढे होने पर कभी मिलेंगे तो इस बात पर बात करेंगे। याद रखना... इसके अलावा भी जिस जिस स्तर पर तुम्हारी टिप्पणी ने मुझे कुरेदा, वह एक निहायत आत्मीय अनुभव है। दिमागी स्तर पर भी इसने बहुत खुराक दी है" कमलेश्वर, सारिका, बम्बई, 29 जवनरी 1971 का पत्र...
"मेरे ऊपर शायद आपका ही लेख पहला है और वह भी इतना सुचिन्तित और तीव्र अन्तर्दृष्टि के साथ लिखा गया है कि आगे जो भी लिखेगा आपकी स्थापनाओं के आस-पास ही घूमेगा... विशेषकर कलासक्ति वाली बात के... अपने उपन्यासों और कहानियों के विश्लेषण ने मुझे सचमुच कई बातें नये सिरे से सोचने और समझने का सुखद अनुभव दिया। आप जानते हैं, यह बात मैं औपचारिकता के नाते नहीं कह रहा... विशेषकर 'उखड़े हुए लोग' पर | मन हुआ था कि आप अन्य उपन्यासों के संदर्भ में अपनी बात कुछ विस्तार से कहते तो यह अतृप्ति ।.... लेख के लिये आपको बधाई या धन्यवाद देना होगा क्या ? क्या यह काफी नहीं है कि इसने मुझे अपने से अलग करके कहीं गहरे उतर जाने को मजबूर कर दिया है।... आपने मोरविया की कहानी पर डि-सिका की फिल्म “टू वीमेन' देखी है न । मुझे वह दृश्य याद आता है जहाँ माँ-बेटी एक गिरजे में शरण लेती हैं और वहाँ सिपाही बेटी को रेप कर डालते हैं और वह अकेली घटना 15-16 साल की किशोरी को रात ही रात में आमूल बदल कर रख देती है, उनके आपसी रिश्ते बदल जाते हैं और वे अब माँ-बेटी नहीं, केवल दो औरतें रह जाती हैं।... दोनों में कोई समानता नहीं है लेकिन न जाने क्यों मुझे यह घटना या 'इमेज' इस समय याद हो आई है... आपका लेख पढ़कर अपने अचानक 'मेच्योर' हो उठने पर.....
राजेन्द्र यादव, राजा मंडी, आगरा, 26 नवम्बर 1963.
'सारिका' जैसी चालू पत्रिका में – जहाँ कभी-कभी कोई नई और अच्छी कहानी और कभी-कभी से भी कम पाठकीय प्रतिक्रियाओं से ऊपर उठी हुई कोई आलोचनात्मक चीज़ नजर आती है- अपनी किताब पर आपकी इतनी सुलझी हुई और सूझ-बूझ से सम्पन्न राय पढ़कर, वह भी इत्तेफाक से, इतनी खुशी हुई कि इस ख्याल के बावजूद कि आपसे इससे पहले कभी ख़तो किताबत करने का अवसर नहीं उठा और आप कहीं इस पत्र को अन्यथा न ले लें, आपको पत्र लिखने बैठ गया हूँ | वहां अगर होता तो शायद यह हिम्मत न कर पाता। यहाँ हूँ और अपनी आवाज़ो से दूर हूँ इसलिये कभी-कभी उस तरफ मुँह करके चिल्लाने, हंसने, रोने या यूं ही शोर मचाने की या गा देने की ख्वाहिश पर काबू पा लेना मुश्किल हो जाता है, इस पत्र का कारण भी यही ख्वाहिश है। कह नहीं सकता कि यह __ पत्र आप तक पहुंचेगा भी कि नहीं लेकिन अगर मिले और आपका मूड बने तो जवाब दीजिएगा।
30 नवम्बर 1971 कृष्ण बलदेव वैद, द स्टेट युनिवसिर्टी कॉलेज एट पाट्सडैम, न्यूयार्क 13676 यू.एस.ए.
'अंधेरा नगर' में वाकई आपने बहुत से सफल प्रयोग किये हैं। मुझे नींद' सबसे ज़्यादा पसंद आई। वैसे हर टुकड़े में कई बातें ख़ूबसूरत है, कई क्षण दिलकश हैं, लेकिन सारी किताब में ऊंच-नीच बहुत दिखाई दी यानि प्रभाव एक सा नहीं पड़ा मुझ पर | एक और बात जो मुझे अखरी वह अंग्रेजी का गैर जरूरी इस्तेमाल है.. लेकिन सारी किताब का अपना एक माहौल जरूर है- उदास, गहरा, डूबा हुआ सा...
10 नवम्बर 1972 कृष्ण बलदेव वैद, द स्टेट युनिवसिर्टी कॉलेज एट पाट्सम, न्यूयार्क 13676 यू.एस.ए.
"हमारे बीच बेशक बुनियादी दार्शनिक मतभेद हैं, मगर फिर भी मैं तुम्हारे लेखन को पढ़कर सदा मुग्ध, परितृप्त होता हूं। मतभेदों के मुद्दों को नजर अंदाज़ कर देता हूं, सिर्फ तुम्हारे अधीत और साहसिक साहित्य विचारक के तेजस्वी वक्तव्य पर मेरी निगाह रहती है। और तुम्हारी कलम के तेवर पर, जिसकी अपनी एक धार (एज) है, पानी है। तुम्हारी उर्दू परिष्कार या उर्दू बैठक की भाषा पर में आशिक हूं, क्योंकि उर्दू की मदाख़लत मेरे यहां भी कम नहीं है। वे तुम्हारी हमारी फितरत में है"..वीरेन्द्र कुमार जैन, बम्बई, 7 अप्रैल 1976
"इतने गहरे एहसास और 'इमेजरी' के साथ कितने समीक्षक साहित्य में उतर पाते हैं रचनाकार का साक्षात्कार करने के लिये समीक्षाकार स्वयं उससे भी बढ़कर रचनाकार न हो जाये, तब तक बात नहीं बनती। वह 'विज़न' और क्षमता तुममें है। कितने-कितने-कितने गहरे एहसास और अवगाहन का माद्दा तुममें है। तुम तो मार्क्सवादी समीक्षक बदनाम हो, | मगर हकीकत यह है कि तुम कोई ‘वादी' नहीं हो, हो तो | सत्यवादी हो। आत्मवादी (रूहानी) हो, सौन्दर्यवादी हो, मानवतावादी हो और उसकी ख़ातिर एक तेजोमान प्रतिवादी | (बागी) हो ...
वीरेन्द्र कुमार जैन, बम्बई, 25 अप्रैल 1977
"जैसे ट्रेन गुफा में से गुजरे और उसके गुप्प अंधेरे में से आदमी कुछ न देख कर भी सब कुछ देख पाने का सुख अनुभव करें, ऐसे 'अंधेरे' की गुह्य गुफा में से होकर गुजरने के बाद चीज़ों को गहराई से देखने समझने का एहसास होने लगा है। जैसे आग में तपकर सोना और भी खरा कंचन होकर निखरता है, ऐसे ही इस पुस्तक में से गुजर कर तुम्हारा व्यक्तित्व खूब ही निखर कर सामने आया है। 'दर्द' को किसी ने इतने नजदीक से देखा होगा... 'व्यथा' को किसी ने इतना जम कर पिया होगा... 'वेदना' को किसी ने इतनी गहराई से सहा होगा.... और 'जीवन' को किसी ने इतनी सूक्ष्मता से समझा और प्यार किया होगा ? इसके उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। लोग 'गर्दिश के दिन' की बात करते हैं। उन्हें क्या पता कि गर्दिश के दिन नहीं, वह जीवन होता है जिसमें | तपकर ही एक जमाने का अर्जुन, धनंजय' बनकर सामने आता है। सोचता हूं, खण्डवा रहकर भी तुम्हें इतने नजदीक से नहीं देख पाया, उतना इस पुस्तक के माध्यम से पा गया और पा क्या गया हूं, अपने कवेलू वाले छत के सूराख में से आने वाली प्रकाश किरण देख कर सूरज को देखने-समझने की बात लिखने बैठ गया हूँ।
रामनारायण उपाध्याय, खण्डवा 06 दिसम्बर 1972.
"अंधेरा नगर" पर प्रतिक्रिया दुबारा भेजने में विलम्ब के लिए क्षमा दें। नान-आफिशियल फार्म में जो आत्मिक बातें कहीं जा सकती हैं, अगर उसमें विवेक भी हो तो रचनात्मक ग्लैमर तो खैर नहीं, उत्कर्षगत निखार जरूर आ जाता है। खास तौर पर 'मृत प्रदेश का निरूद्ध संगीत' को लें... शुरू से लेकर आखिर तक फार्मलेसनेस है और यही संभवतः इसे एक नई प्रकृति में, नए चरित्र ढालता है। 'बन्द कमरे में चीख' में मुझे अंधकार की उपेक्षा और दूर तक देखते रहने की कोशिश नजर आती है। कुछ अधिक काव्यगत ढंग से कहूं तो यही कहना पड़ेगा कि इसमें अभी-अभी तैयार पेंटिंग है, ..... पेंटिंग में आसमानी रंग की वह रोशनी है जिसमें अनुभव घुलकर फैल गया है। नान आफशियल फार्म की ये रचनाएँ, कविताएं निखार, एक बहुत बड़े कैनवास पर आत्मा की बनती हुई तस्वीर ही है शायद...... प्रणवकुमार बन्धोपाध्याय, नई दिल्ली 6 मार्च 1973
"समकालीन आलोचकों में मैं आपको जिस महत्वपूर्ण स्थान __ पर रखता हूँ, उसकी अभिव्यक्ति इस कारण नहीं हो पाई कि मैं बहुत व्यवस्थित नहीं रहा। मुझे यकीन है- समय आपकी महत्ता को और ज्यादा दबाकर नहीं रख पायेगा......
प्रणवकुमार बन्द्योपाध्याय, नई दिल्ली 10 अगस्त 1993
"आलोचक धनंजय वर्मा साहित्य, लेखन और लेखक को अपने पैमाने पर जाँचते रहे हैं। कई लेखक और आलोचक अलग-अलग कारणों से उनसे असहमत अवश्य होते रहे हैं लेकिन आज के लेखन पर वे अपनी राय बिना किसी लाग-लपेट के साथ, समय- समय पर देते रहे हैं। इससे किसी न किसी बहाने वे विवादों के घेरे में जरूर आते रहे हैं लेकिन साहित्य की प्रगतिशीलता के साथ वे इस तरह लगातार चलते रहे कि आज के लेखन को निश्चित ही एक गरिमा प्राप्त हुई है। यह दूसरी बात है कि धनंजय वर्मा ने साहित्य का उपयोग दलगत स्वार्थों में नहीं किया और वे तमाम मुद्दों का आकलन बिना किसी झिझक के पाठक के सामने लाते रहे हैं..
प्रणवकुमार बन्योपाध्याय, जनवरी-मार्च 2005 ‘पश्यन्ती' की सम्पादकीय टिप्पणी।
"आलोचना की रचना यात्रा' पढ़ चुका हूँ | पढ़ते समय मुझे ऐसा लगा जैसे मैं कोई सरस काव्य पढ़ रहा हूँ | बातें सारी सटीक, नपी-तुली स्थापनाएं, गंभीर और सर्वरूपेण ग्राह्य | लोग आलोचना को नीरस, शुष्क और उबाऊ कहकर उसे अंकगणित के फार्मूलों से सम्बद्ध कर देते हैं परन्तु श्री धनंजय वर्मा ऐसे आलोचक हैं जो सारे फार्मूलों की सीमा तोड़कर स्वयं निजी फार्मूले देते हैं और निजी सांचे में ढालकर आलोचना को केवल वैज्ञानिकता ही नहीं देते बल्कि उसे मनोवैज्ञानिक बना देते हैं। यही उनकी आलोचना की विशेषता है जिसके कारण वे पारम्परिक आलोचकों से हटकर अपना नया स्थान निर्धारित कराते हैं । इस आलोचना कृति से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ और कई नई बातें मुझे सीखने को मिली हैं। एतदर्थ मेरी बधाई स्वीकार करें...।
आचार्य बैजनाथ राय, कलकत्ता 13 अक्टूबर 1978
"आपका आलेख एक बार नहीं, तीन बार मैंने पढ़ा है। आपने जिस तरह डूबकर रिशतों की ऊष्मा, उत्कट ईमानदारी (जिसे मुक्ति बोध कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी कहते थे) उसमे मिलती है। बिना किसी लाग लपेट के संबंधों को लगभग अनदेखा करते हए। और संभवत: इसीलिये आपकी आलोचना में एक गहरी तड़प और ऊर्जा होती है। सबसे बड़ी बात तो यह कि आपकी आलोचना में स्तरीयता, पठनीयता और संवेदनशीलता भरपूर है। आज आलोचना जिस तरह प्रायोजित हो रही है, वह मुंह देखी, मुंहजोरी तो करती ही है, अनावश्यक फैसले भी थोपती है। उससे एक तरह की ऊब और वितृष्णा पैदा होती है। "समावेशी आधुनिकता' पढ़ते हुऐ मुझे बहुत अच्छा लगा था। आप अपने निर्णयों के लिये किसी दूसरे पर निर्भर नहीं होते, अपनी जमीन पर खड़े होते हैं। आपके सामने व्यक्ति नहीं, वह कृति या कृतियां होती हैं, परंपरा, इतिहास और युग होता है जिनका आप अपनी आलोचना में सामना कर रहे होते हैं...
डॉ. सेवाराम त्रिपाठी, रीवा, 15 सितम्बर 1997
'आस्वाद के धरातल' मौलिक चिंतन की एक जीवंत कृति है। विषयों का चुनाव, विषय प्रतिपादन की निजी शैली और विषय के महत्व को सिद्ध करने के लिये अपनाया गया ढंग इसे अन्य की अपेक्षा सर्वोत्कृष्ट प्रमाणित करते हैं। समकालीन साहित्य पर विषयानुकूल प्रौढ़ चिन्तन, एक विशिष्ट अन्दाज़ के साथ लेखक ने कलमबद्ध किया है... अमृतलाल सागर, लखनऊ
'आस्वाद के धरातल' सृजनात्मक साहित्य की एक बेजोड़ कृति है। लेखन में मौलिक चिंतन और लेखन की असंदिग्ध क्षमता है। साहित्य की गहरी पकड़ और जीवंत विचारों को नए मुहावरे में कहने का सामर्थ्य है। निःसंदेह यह कृति नई समीक्षा में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है। तमाम पुस्तकों में "आस्वाद के धरातल' मेरे विचार से इस लिये सर्वोपरि है कि जहां अधिकांश में पाण्डित्यपूर्ण प्रयास हैं। "आस्वाद के धरातल" समीक्षा साहित्य में एक नया प्रतिमान स्थापित करती है...
डॉ. प्रेम शंकर, सागर आचार्य नन्दुलारे वाजपेयी आलोचना पुरस्कार (1971) से पुरस्कृत पुस्तक पर निर्णायकों के अभिमत (म.प्र.साहित्य परिषद की मासिकी : आलेख: दिसम्बर 1974 में प्रकाशित)
पुस्तक-त्रयी : (आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, आधुनिकता के प्रतिरूप और समावेशी आधुनिकता) के बारे में. "लेखक ने अपनी मौलिक दृष्टि से आधुनिकता, आधुनिकीकरण, समकालीनता परम्परा आदि प्रत्ययों के विषय में अभूतपूर्व विवेचन किया है। लेखक के चिन्तन, विषय के __एपरोच और विश्लेषण में अभूतपूर्वता है। आधुनिकता के प्रत्यय के सन्दर्भ में लीक से हटकर अपना विशिष्ट सोच-विचार प्रस्तुत किया है। इससे लेखकों, आलोचकों के मस्तिष्क में बने बनाये ढांचे टूटेंगे और आधुनिकता, समसामयिकता आदि के विषय में पुनर्विचार करना होगा। लेखक में उच्च कोटि की आलोचनात्मक क्षमता है और आद्योपान्त अपने दृष्टिकोण को अध्ययन और तर्कों से पुष्ट करने का प्रतिभा ज्ञान.....
डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, जयपुर
"आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय" को सहज ही आधुनिकता सम्बन्धी अवधारणा का विश्वकोष कहा जा सकता है। 'आधुनिकता के प्रतिरूप' में धनंजय वर्मा के द्वारा किये गये पुर्नमूल्यांकन से हम सहमत हों या न हों किन्तु वह विचारोत्तेजक अवश्य है।
डॉ. हरदयाल (वैचारिक) दिल्ली
“वसुधा" में सम्पादकीय लेख तो बहुत अच्छा है ही। मैं तुम्हें विशेष रूप से बधाई देना चाहता हूं- एहतेशाम के उपन्यास के बहाने तुम्हारे लेख पर | मैंने यह उपन्यास पढ़ा नहीं है मगर तुम्हारा लेख स्वतंत्र है और बहुत पेचीदा और बहुत नाजुक वास्तविकता को बड़ी समझ और गहराई से "ट्रीट'' करता है। "मुक्त धारा में बहस शुरू की थी- अमृत राय ने, फिर मैंने, अमृतलाल नागर और सुभद्रा जोशी ने लिखा था । बातें तकलीफदेह हैं- मगर इस बढ़िया लेख के लिये फिर बधाई लो...
हरिशंकर परसाई, जबलपुर 20 मार्च 1989
"आपने तीस वर्ष पूर्व मुझे जितनी विलक्षणता से बांधा था, उतना सही कोई नहीं आंक पाया। 'मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें में मैंने वही भूमिका दी थी। अगले वर्ष भारतीय ज्ञानपीठ पांच सौ पृष्ठों का, मेरी चुनी हुई सौ व्यंग्य रचनाओं का, संग्रह छाप रहा है और मैं फिर वही भूमिका दे रहा हूं। यूं अब तक कितने ही बड़े लोग मेरे बारे में बहुत कुछ लिख चुके हैं पर वह सब या तो अतिशयोक्ति है या फिर व्यक्तिगत प्रतिक्रिया- और कुछ नहीं । आप जैसा पारखी मुझे दूसरा नहीं मिला।"
रवीन्द्रनाथ त्यागी, देहरादून 13 मार्च 1996
"कल मैंने आपको एक पत्र लिखा ही था कि तभी आपका लेख आ गया। समझ नहीं पा रहा हूं कि किन शब्दों में आभार प्रदर्शित करूं... समयाभाव और परेशानियों के बीच आपने लेख लिखकर भेजे, यह क्या कम है ? अब बधाई लीजिए। आते ही पहले मैंने उसे पढ़ा, फिर राजेन्द्र को पढ़कर सुनाया। तभी एक मित्र आ गये। उनसे बात नहीं की, पहले उन्हें बिठाकर लेख सुनाया। जिस रूप में चाहती थी, उसी रूप में आपने बात को उठाया है और बहुत ही सुन्दर ढंग से उठाया है। हाँ, अन्त कुछ और करते तो ज्यादा अच्छा रहता। बात जिस खूबी से आरंभ हुई, आगे चली, उसी खूबी से अंत नहीं हुआ। हो सकता है, यह मेरा भ्रम ही हो । पर कुल मिलाकर मुझे लेख बहुत-बहुत पसंद आया..... और इसी लिये धन्यवाद और बधाई साथ साथ भेज रही हूं.....
मन्नू भण्डारी, कलकत्ता, 8 मार्च 1963
‘पश्यन्ती' में अभी-अभी पढ़ा है- डॉ. साहब से सम्बंधित लेख (?) 'खुतूत से नुमायाँ भारती' | आँखें नम हैं और सब कुछ ठहर गया है जैसे... उनकी स्मृति में | पत्र तो बहुतों के, बहुत बार छपे हैं और उन्हें पढ़ा भी है, दो विचारकों के बीच संवाद की तरह,लेकिन आपने जिस तरह पत्रों के माध्यम से व्यक्ति के प्रचलित व्यक्तित्व और शब्द व्यक्तित्व का तुलनात्मक रूप अन्वेषित किया है- दुर्भाव को फीच-निचोड़, वह छू गया, बल्कि कहूँ सर्जना की एक अनूठी विधा निकलकर सामने आई है। आप कई महत्वपूर्ण सर्जकों से हुऐ पत्र संवाद को इसी रूप में लिख कर रोचक पुस्तक तैयार कर सकते हैं-'खुतूत से नुमाया सर्जक'.पुनः बधाई..
चित्रा मृदुल दिल्ली 27 अप्रैल 2000 का पत्र।
"आपकी कविताएं मुझे बहुत अच्छी लगी जो कविताएं आपकी माता जी से सम्बंधित हैं वह भी मुझे बहुत पसंद आईं। यह कविताएं बहुत सुंदर और हृदय स्पर्शी हैं। जिन प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन आप देते हैं उन्हें मुझे भी देखने की इच्छा है...
विक्टोरिया शीलिना, लेनिनग्राद, यू.एस.एस.आर 15 जनवरी 1987 का पत्र।
"आप प्रतिभा संपन्न आलोचक हैं, जिसका ज्ञान 'आस्वाद के धरातल' और 'सारिका' और 'नई कहानियां' में प्रकाशित आपके आलोचना निबंधों से होता है। अभी 'सामाजिक चुनौतियां : आज की कहानी' पढ़ा । आपके लेखों ने मेरे कुछ पूर्व स्थापित निष्कर्षों को बदलने पर मजबूर किया। आप उन सामाजिक परिस्थितियों पर जोर देते हैं, जो रचना प्रक्रिया कि जननी है। ...आपकी कहानी भी पसंद आई। सौम्य सुसंस्कृत शैली और किफायती लफज़ों ने 'कलश और कंगूरे' को बातूनी कहानियों से पृथक किया। यह एक उपलब्धि है। मैं समझता हूँ कि माँ नाम की बहुरूपी, ठोस और वांछनीय संस्था का प्रतिमान, स्थिति युक्त संवाद के माध्यम से आपने अभिव्यक्त किया।
ज्यूलियस पारनोव्स्की, वारसा, पौलेण्ड, 5 अगस्त 1971 का पत्र।
"हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि युवा लेखन की जैसी सही पकड़ और वास्तविक समझदारी आपके पास है, वैसी शायद ही किसी के पास हो । आपने युवा मानसिकता को एक 'फोर्स' के रूप में लेखन के अंतर्गत प्रतिष्ठित किया है...
मधुकर सिंह, धरहरा, आरा, बिहार 7 जुलाई 1972 का पत्र
बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल की पी.एच.डी. उपाधि के लिये स्वीकृत शोध प्रबंध "समकालीन हिन्दी आलोचना और डॉ. धनंजय वर्मा का योगदान" के लिये डॉ. नीता व्यास द्वारा संकलित।
***हिंदी के प्रख्यात आलोचक-लेखक धनंजय वर्मा ने नयी कहानी आंदोलन में सीधे हस्तक्षेप किया था। धनंजय वर्मा ने नामवर सिंह की निर्मल वर्मा की 'परिंदे' को नयी पहली कहानी की स्थापना को लेकर सीधे तौर पर लेख लिखकर नाराजगी मोल ली थी। जब हरिशं More...
*** हिंदी के प्रख्यात आलोचक-लेखक धनंजय वर्मा ने हिंदी साहित्य में "रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, संदर्भ: नवजागरण" विषयक इंटरव्यू में शुक्लजी की भूमिका को अग्रणी मानते हुए कहा कि उनके बाद चाहें कोई भी आलोचक हिंदी में हुए हों, प्रका More...
***हिंदी के प्रख्यात आलोचक-लेखक धनंजय वर्मा ने नयी कहानी आंदोलन में सीधे हस्तक्षेप किया था। धनंजय वर्मा ने नामवर सिंह की निर्मल वर्मा की 'परिंदे' को नयी पहली कहानी की स्थापना को लेकर सीधे तौर पर लेख लिखकर नाराजगी मोल ली थी। जब हरिशं More...
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***हिंदी के प्रख्यात आलोचक-लेखक धनंजय वर्मा ने बड़ी स्पष्टता से लहक संपादक (निर्भय देवयांश) के साथ दूरभाष पर बातचीत में कहा है कि रामचंद्र शुक्ल, तुलसीदास और जयशंकर प्रसाद के जातीय बोध में कोई अंतर नहीं है। जो अंतर देखते हैं यह उनका More...
हिंदी नयी कहानी आंदोलन के अगुआ आलोचक धनंजय वर्मा भोपाल के स्वराज्य भवन में (जनवरी 2019) में मानबहादुर सिंह लहक सम्मान (कोलकाता) से सम्मानित किए गए। वर्मा जी ने नयी कहानी की बारीकियों को समझते हुए उनके पक्ष में आवाज उठायी। न सिर्फ नयी More...
धनंजय वर्मा | Dhananjay verma |व्यक्तित्व कृतित्व कविताएं संस्मरण ।प्रसिद्ध समालोचक More...
***हिंदी के प्रख्यात आलोचक-लेखक डॉ. धनंजय वर्मा विश्व हिंदी दिवस और विश्व हिंदी सम्मेलन की धारणा-अवधारणा से बहुत सहमत नहीं हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि कथनी-करनी में जो अंतर है, उसके रहते हम हिंदी को बेहतर नहीं कर सकते हैं। डॉ. वर्मा More...
***हिंदी के प्रख्यात आलोचक-लेखक डॉ. धनंजय वर्मा विश्व हिंदी दिवस और विश्व हिंदी सम्मेलन की धारणा-अवधारणा से बहुत सहमत नहीं हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि कथनी-करनी में जो अंतर है, उसके रहते हम हिंदी को बेहतर नहीं कर सकते हैं। डॉ. वर्मा More...
Laal Salaam :आलोचक का दायित्व और चुनौतियां Shailendra Shaili with Dhananjay Verma More...